रोम रोम से निकले प्रभुवर नाम तुम्हारा | Rom rom se nikle prabhuvar naam tumhara

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रोम रोम से निकले प्रभुवर नाम तुम्हारा, हाँ! नाम तुम्हारा – २
ऐसी भक्ति करूँ प्रभुजी, पाऊ न जनम दोबारा।
रोम रोम से निकले…

– १ –

जिनमंदिर में आया, जिनवर दर्शन पाया।
अन्तर्मुख मुद्रा को देखा, आतम दर्शन पाया।
जनम-जनम तक न भूलूंगा – २, यह उपकार तुम्हारा।
रोम रोम से निकले…

– २ –

अरिहंतो को जाना, आतम को पहिचाना।
द्रव्य और गुण पर्यायो से, जिन सम निज को माना।
भेदज्ञान ही महामंत्र है – २ , मोह तिमिर क्षयकारा।
रोम रोम से निकले…

– ३ –

पञ्च महाव्रत धारू, समिति गुप्त अपनाऊँ।
निर्ग्रंथों के पथ पर चलकर, मोक्ष महल में आऊँ।
पुण्य-पाप की बांध श्रृंखला – २ , नष्ट करूँ दुःखकारा।
रोम रोम से निकले…

– ४ –

देव-शास्त्र-गुरु मेरे, है सच्चे हितकारी।
सहज शुद्ध चैतन्यराज की, महिमा जग से न्यारी।
भेदज्ञान बिन नहीं मिलेगा – २ , भव का कभी किनारा।
रोम रोम से निकले…

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